दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
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बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

गले लगाया हार को

मेरी जीत से था
बस चंद फासला,
इतना
की मैं हाथ बढ़ा कर
उसे चूम लेता,
पर मैंने दौड़ के
गले लगाया हार को,
क्योंकि हार थी
मायूस, और बे-नूर,
सबने ही उसे बे-मन से अपनाया था,
मैंने हार चुन ली,
क्योंकि,
जीत मेरी फितरत नहीं थी,
अब मैं हूँ
और मेरे घर में,
मेरे साथ मेरी हार है,
वो बेहद एहसान मंद है मेरी,
और अक्सर,
मुझसे लिपट के रोती है,
कहती है,
"तुम जीत के लिए बने हो,
जाओ, उसे ले आओ",
पर मैं भी जज्बातों की किश्ती का,
अनोखा सवार हूँ,
जब तक जान है,
हार का साथ न छोडूंगा,
वो मेरी हमनवां,
हमसफ़र,
हमराज़ है,
जीत तो तवायफ है,
उससे वफ़ा की आस बेमानी है,
मैं जानता हूँ,
कल जब मैं फिर से तैयार होके,
और अपने को और ज्यादा सजा के,
गुजरुंगा उस बदनाम गली से,
तो वो झज्जे पे खड़ी,
मुझे इशारों से बुलाएगी,
चंद रुपयों की खातिर वो,
वो कुछ देर को मेरी हो जाएगी,
मगर तब भी हार मेरा घर पे रास्ता देखेगी,
मैं जीत के नशे में चूर,
जब लौटूंगा घर पे,
वो बड़े इसरार से पूछेगी,
आज बड़ी देर कर दी?
सुबह तक,
जीत की खुमारी उतरेगी,
और, बीती रात,
की कसक,
मेरी रुमालों में हफ्तों तक रहेगी,
किसी सस्ते ईत्र की तरह...

1 टिप्पणी:

VIDHI ने कहा…

EK EK LINE KA ITNA DEEP MEANING HAI ITS SHOWS A REALTY OF OUR LIFE BAHUT PASAND AAYE HUME YE KAVITA........REAALY VERY TOUCHING