शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
क्या कहना....
क्या कहना है, उफ़! मुस्कानों का,
जो खुल के जज़्बात दिखाती हैं...
पर अक्सर ये दर्द के ,
माने बन होठ पे आती है...
क्या राज़ छुपा मुस्कानों में ,
ये बतला दो मुझको भी,
थोडा भी दिल के पास हूँ तो ,
अपना लो झट से मुझको भी ....
क्या कहना....
क्या कहना है, उफ़! मुस्कानों का,
जो खुल के जज़्बात दिखाती हैं...
पर अक्सर ये दर्द के ,
माने बन होठ पे आती है...
क्या राज़ छुपा मुस्कानों में ,
ये बतला दो मुझको भी,
थोडा भी दिल के पास हूँ तो ,
अपना लो झट से मुझको भी ....
गुमसुम सी ज़िन्दगी....
गुमसुम सी ज़िन्दगी, है तल्ख़ ये ज़माना,
उलझा हुआ सा अपनी तकदीर का फ़साना...{1}
हर कोई चल रहा है, हर कोई है मुसाफिर,
किस से करूँ गुजारिश, अब छोड़ के न जाना....{२}
अब तंग है नज़रिया, ना-पाक हैं इरादे,
मुमकिन नहीं चमन में, अपनी जगह बनाना...{३}
नाराज़ हो के उनसे , "वैभव" कहाँ पे जाये,
मुश्किल है आइनों से अपनी नज़र चुराना ....{4}
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008
ये क्या हो रहा है...?
दोस्तों, मैं नही जानता की ये क्या हो रहा है... शायद आप कुछ मदद
कर सकें......
मनाओ दिवाली
रावण जलाया तुमने, कहा बुराई का प्रतीक था,
पर माटी के नन्हे कोमल दीयों को क्यों जलाया, क्योकि तुम सब अपनी ख़ुशी के लिए करते हो... न तुम्हें बुराई से कुछ मतलब है, और न ही अच्छाई से कुछ लेना-देना है, न तो पटाखों से उठने वाले प्रदुषण का मलाल है, और न ही उनके शोर का, तुम स्वार्थी हो, तुम्हें बस अपनी दिवाली मनानी है.... शगुन-अपशगुन का ख्याल रखना है... मनाओ दिवाली, मेरी तरफ से भी दिवाली की शुभकामनाएं तो लेते जाओ...
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