शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
बादशाह , नमस्ते नहीं करते
"बादशाह , नमस्ते नहीं करते , वो सलाम करते हैं .." जल्द ही आप पढ़ सकेंगे... यहीं पर...
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010
गुमशुदा
हमारी आवाज़ में न हक की लड़ाई थी ,
न निगाहों में कोई अदावत की थी परछाई,
मगर फिर भी हजारो टुकड़े किये इस दिल के , दुनिया ने ,
और ऐसे बिखरा उनको ,
की लाख कोशिशों के बाद भी ,
तस्वीर पुराने से दिल की मुकम्मल नहीं होती,
शायद ! वो एक टुकड़ा ,
आज तक , कहीं गुमशुदा सा ही है ...
न निगाहों में कोई अदावत की थी परछाई,
मगर फिर भी हजारो टुकड़े किये इस दिल के , दुनिया ने ,
और ऐसे बिखरा उनको ,
की लाख कोशिशों के बाद भी ,
तस्वीर पुराने से दिल की मुकम्मल नहीं होती,
शायद ! वो एक टुकड़ा ,
आज तक , कहीं गुमशुदा सा ही है ...
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
दिल्ली और आस-पास
ऐ मेरे आका, कुछ जुगत ऐसी भिड़ा,
इतवार को ही सारी भेड़े न चारा....
उनको लगाव है, गालियों से इस कदर,
पूछते हैं हमसे, दिल्ली में नए हो क्या?...
दिल्ली के आस-पास, कंक्रीट के जंगल, हैं भेड़िये उनमे,
पहन कोट ठाठ से , भेड़ों की खाल का...
निकल गए वो जब सड़कों पे एक साथ,
एहसान का धुआं छोड़, खुंखारते "हुआ-हुआ " सा...
पांच दिन के काम की, थकान उतारने को,
माल में लड़े, हड्डी पे कुत्तों सा...
इन भेड़ियों से बच के, चलना ही होगा,
है इनको बड़ा गुमान, दिल्ली में बसने का...
सैकड़ों मील दूर, है बीवियां इनकी,
यहाँ पे है तमगा, निपट कुवारेपन का...
हैं औरते यहाँ, कुछ अलग, खूबसूरत,
देखें वो इनको, धंधेवालियों सा...
यहाँ पर सभी को बेवक़ूफ़ बना के,
लौटेंगे छुट्टियों में घर, रण-बांकुरों सा...
इतवार को ही सारी भेड़े न चारा....
उनको लगाव है, गालियों से इस कदर,
पूछते हैं हमसे, दिल्ली में नए हो क्या?...
दिल्ली के आस-पास, कंक्रीट के जंगल, हैं भेड़िये उनमे,
पहन कोट ठाठ से , भेड़ों की खाल का...
निकल गए वो जब सड़कों पे एक साथ,
एहसान का धुआं छोड़, खुंखारते "हुआ-हुआ " सा...
पांच दिन के काम की, थकान उतारने को,
माल में लड़े, हड्डी पे कुत्तों सा...
इन भेड़ियों से बच के, चलना ही होगा,
है इनको बड़ा गुमान, दिल्ली में बसने का...
सैकड़ों मील दूर, है बीवियां इनकी,
यहाँ पे है तमगा, निपट कुवारेपन का...
हैं औरते यहाँ, कुछ अलग, खूबसूरत,
देखें वो इनको, धंधेवालियों सा...
यहाँ पर सभी को बेवक़ूफ़ बना के,
लौटेंगे छुट्टियों में घर, रण-बांकुरों सा...
मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010
ख्याल में आया जाये...
सोचता हूँ की कैसे उनके ख्याल में आया जाये,.
गढ़ू कौन सा तिलिस्म, की मिसाल में आया जाये...
मैं ये हूँ, मैं वो हूँ, लिख-लिख के थक गया हूँ,
तरस खा सके सभी, ऐसे किस हाल में आया जाये....
हूँ उनके खेल का अदना सा, छोटे दायरे वाला प्यादा,
सोच में हूँ की कैसे, उनके शह में काम आया जाए...
वो राजा हैं, मैं गंगुआ हूँ, तरकीब तो बताओ,
जूं बन के उनके कान पे किस तरह रेंगा जाए...
वो खा चुके कई गरीबों के घर नमक-रोटी,
अब उनको नमक-हलाली के, जज़्बात सिखलाया जाये...
दो कदम अर्जिया, मेरी बढ़ी उनके तलक,पर ,
उड़ते सिफारिशी पैगाम से, कदम कैसे मिलाया जाये....
अटक गयी है फिर से, मुंडेरों पर पतंग सी उम्मीदें ,
महराब के घुमाओ में, कब तक सर खपाया जाये...
शनिवार, 6 फ़रवरी 2010
हर इक बात बेमानी...
नजाकत से नफासत तक, हर इक बात बेमानी,
हटा लो उसको, जिसकी, मर चुका है आँख का पानी...
अदा उसकी कोई भी, दिल को छु कर नहीं गुजरी,
की सब जानते हैं, उसकी दिखावे की है कुर्बानी...
वो जो करते हैं, बेहद ढंग से, सजदे नमाज़ों में,
उनके सर कई है जुल्म गुमनामी...
है उनके हाथ में ताक़त मगर आका है वो अपना,
बचे फसलें भला कैसे, है चूहों की निगेहबानी...
उनका ही कमाल है , बताऊँ कैसे ये तुमको,
बनाते कायदे वो ही, है उनका लफ्ज़ फ़रमानी...
बन्दर-बाट में माहिर, है तबियत के धनी बेहद,
झुकें गर्दन जो सजदे में, बख्शें उसको ही हमनामी...
हटा लो उसको, जिसकी, मर चुका है आँख का पानी...
अदा उसकी कोई भी, दिल को छु कर नहीं गुजरी,
की सब जानते हैं, उसकी दिखावे की है कुर्बानी...
वो जो करते हैं, बेहद ढंग से, सजदे नमाज़ों में,
उनके सर कई है जुल्म गुमनामी...
है उनके हाथ में ताक़त मगर आका है वो अपना,
बचे फसलें भला कैसे, है चूहों की निगेहबानी...
उनका ही कमाल है , बताऊँ कैसे ये तुमको,
बनाते कायदे वो ही, है उनका लफ्ज़ फ़रमानी...
बन्दर-बाट में माहिर, है तबियत के धनी बेहद,
झुकें गर्दन जो सजदे में, बख्शें उसको ही हमनामी...
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