पिप्पली लाइव की चर्चा हर कहीं हैं... मगर मुझे उस नौजवान दर्शक की टिपण्णी याद आ रही है जो फिल्म ख़तम होने के बाद ये कहता निकल रहा था, "मज़ा आया, बहुत अच्छी कॉमेडी थी..." पहले जिस तरह हम आदिवासिय्यों के अर्ध-नग्न पोस्टर्स से घर सजाते थे, और उसे कला का नमूना मानते थे, ठीक वैसे ही आज हमारे गाँव और वहां की समस्याएं हमारे घर सजाने का सामान और कॉमेडी की भरपाई का यंत्र बन गए हैं.
आमिर खान ने माल संस्कृति के दर्शको के लिए पिप्पली लाइव बनायी, और मल्टीप्लेक्स का दर्शक इसकी गंभीरता को दरकिनार करते हुए इसपे हँसता हुआ मनोरंजन का मसाला समझ देख रहा है. नत्था की बेबसी पर उसे हंसी छूट रही है. बुधिया की गालियों को वो बड़े प्यार से सुन रहा है...
गालियाँ उसे फिल्म से जोड़ रही हैं... मगर सवाल ये है की क्या इतने गंभीर विषय को देखने और समझने की ताकत मल्टीप्लेक्स के दर्शको की है?
फिल्म की बात करें तो इसमें नया कुछ भी नहीं है. फिल्म की कहानी अनुषा ने मुंशी प्रेमचंद की "कफ़न" से चुरा ली है, जहाँ बीवी के लिए कफ़न खरीदने गए दोनों पात्र दारु में टल्ली हो झूमते हैं और बीवी अन्दर तड़प तड़प के मर जाती है... फिल्म में अनुषा ने राज कपूर की "तीसरी कसम" की तरह गीत डाल दिया, उसमे "चलत मुसाफिर था... , इसमें "महंगाई डायन...." है ...
विशाल भारद्वाज की "ओमकारा" की तरह बेवजह की गालियाँ हैं.. और "मैं आज़ाद हूँ" की तरह मीडिया की लड़ाई और नायक के मरने की खबर का फायदा उठाते नेता और सरकार...
मीडिया के एक "दम्पति पत्रकार" (राधिका और प्रणव रॉय) को फिल्म की शुरुआत में धन्यवाद दिया गया है, जिसने की फिल्म में संसाधन उपलब्ध कराये होंगे, तो साहब वो कैसे पीछे रहते, लगे हांथों उन्होंने एक "ख़ास" न्यूज़ चैनल (स्टार)के एक "ख़ास" रिपोर्टर (दीपक चौरसिया)पर "खुन्नस" निकाल डाली है...
इतने गंभीर विषय को अच्छा ख़ासा मज़ाक बना दिया है आमिर खान ने, अब वो अपनी फिल्म की नुमाइश दुनिया भर में करेंगे "इंडिया सर ये चीज़ धुरंधर..." की रटन लगायेंगे और हो सकता है, इस बार वो "लगान" से ज्यादा पुरस्कार पा जाएँ...
देश की गन्दगी को शायद आमिर अब पश्चमी देशों में वाहवाही लूटने के लिए ही परदे पर ला रहे हैं...आमिर के लिए उन्ही की इस फिल्म की वो लाइन बिलकुल फिट बैठती है... "जेब दलिद्दर, दिल है समुन्दर..." रुपये कमाने के बाद अब उनका दिल पुरुस्कारों का भूखा है, और भूखा आदमी कुछ भी खाने से नहीं चूकता...
ये हमारी बद्किस्माती है की हम इसे एक फिल्म मान कर बैठ जाते हैं... मगर गौर करने लायक ये है की ये फिल्म नहीं, देश के खिलाफ एक साज़िश है जिसे पूरी शिद्दत के साथ परदे पर उतारा जा रहा है...
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
मेरे बचपन का गाँव...
इक मंदिर है, इक मस्जिद है, इक ताल, एक तलैया है,
कुछ पक्के हैं, कुछ कच्चे हैं,
कुछ छोटी बड़ी मड़ैया हैं,
कुछ खेत भी हैं, खलिहान भी हैं,
परधान का बड़ा मकान भी है,
ठंडी, गर्म हवाएँ हैं,
कजरी, चैती बिरहाये हैं,
जोगन भी है, जोबन भी है,
कुछ आहें और सदाएं हैं,
मेरे बचपन का गाँव है ये,
जिसकी कई कथाएँ हैं.
कुछ पक्के हैं, कुछ कच्चे हैं,
कुछ छोटी बड़ी मड़ैया हैं,
कुछ खेत भी हैं, खलिहान भी हैं,
परधान का बड़ा मकान भी है,
ठंडी, गर्म हवाएँ हैं,
कजरी, चैती बिरहाये हैं,
जोगन भी है, जोबन भी है,
कुछ आहें और सदाएं हैं,
मेरे बचपन का गाँव है ये,
जिसकी कई कथाएँ हैं.
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
Less importnt for u, but other's needs that due...
Like a fresh rose,
Like a fresh drop of dew,
U r all new,
Can u tell me, who r u?
Soon I asked this,
To the grass and park…
I wasn’t alone,
In search of some unknown,
Seated on a bench,
Seeing either side’s
Graveyard, which is like my mood,
Compiled with gray tone.
After a bunch of time,
I’ll have to go back,
Take with a fresh air,
And backing like relax track,
And
Like a river moved from
Banks,
Banks,
I too moved from here,
Till tomorrow evening,
This bench and this park’s
Slightly yellowish grass,
Would Play with my,
All thrown sorrows,
And heavy mood,
Like a ping-pong….
Tomorrow,
Will back I,
They both will goose me
With there
Child like eye…
Nothing happened.
Act and lie –
“We don’t use the thrown
Things…Noah…”
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
ग्यारह महीने...
अपने घर में इक कील भी लगाओ तो,
वो अपनी सी लगती है,
ऐसा मेरी माँ कहती थी,
अक्सर मेरे पिताजी से..
सरकारी नौकरी में,
इमानदारी की मिसाल बन,
अपने घर का सपना पालना?
पिताजी उस पहाड़ की ऊँचाई से वाकिफ थे,
पर माँ तो माँ है,
उसके लिए चौतरफा दबाव है,
...कुछ बेच के,
इमानदारी को निचोड़ के,
पुरखों के सपने ख़ाक कर,
एक सरकारी योजनाओं का,
घर ले ही लिया,
मगर जब रहने की बारी आई
तो तबादला और बिमारी लायी,
फिर उस "अपने" घर में ताला लगा,
कुछ बर्तन और कुछ बिस्तर ले,
एक नए शहर में...
सब कुछ "अपने" घर में,
ताले में बंद था,
यहाँ, हर महीने मकान-मालिक.
का "पठान" की तरह आना.
माँ का आश्वासन की कल आना
हर ग्यारह महीने पर,
मकान बदलने की,,
प्रसव-वेदना सा झेलना...
एक तनख्वाह,
ज़मीन पे सोना,
पिताजी और माँ का कहना,
क्या करना है यहाँ कुछ सामान खरीद कर,
कोशिश करिए,
वापस अपने शहर तबादला ले लीजिये,
बाट जोहते तबादले की,
साल दर साल निकलते गए,
माता और पिताजी,
बुढ़ापे की और बढ़ते गए,
मगर अपने घर की आस में,
हम किसी और घर में,
अपने अपने कोने की हिफाज़त करते रहे,
यही सोच, किराए के घर को
नए शहर को,
और उस नए शहर के लोगों को
ये सोच न अपना सके की,
"ये अपना नहीं है",
एक दिन हम "अपने" घर में जायेंगे,
आखिर किराये के मकान में ही,
पिताजी रिटायर हो गए,
दिल में अनेको दर्द लिए,
दिल के ओपरेशन की डगर चल दिए,
फिर 'अपने" घर जाने के इंतज़ार में,
कई साल कौवो को सुन सुन के बिताये,
बात बेटियों की शादी की आई,
"अपने" बेगाने हुए,
तो फिर "अपने" घर की याद आई.
इस बार, उसका दाम लगा,
बिक गया,
बेटी की शादी हुई,
लेकिन माँ का सपना,
अधूरा रहा ,
कुछ साल, और भटक के,
हर ग्यारह महीने में
जड़ से कट कट के...
पिताजी इस दुनिया से उठ गए,
किराए के माकन से ही उनका
जनाज़ा निकला,
माँ आज भी रोती हैं,
मगर किराए के घर की दीवारों के सिवा,
उनके आंसुओं का कोई और,
गवाह नहीं है....
बेटा अभी भी ग्यारह महीने के खौफ्फ़,
में ही जीता है,
माँ, अपने भगवान् की मूर्तियों,
के लिए हर नए किराये के मकान में,
जगह ढूंढ लेती है...
ग्यारह, दस, नौ, आठ….
वो उलटी गिनती,
जो माँ की चिंता का सबब है,
और जो बेटे के माथे की
बढती चौड़ाई से भी,
डरती नहीं है,
वो तो बस घटती जा रही है,
ग्यारह, दस, नौ, आठ…..
==============
वो अपनी सी लगती है,
ऐसा मेरी माँ कहती थी,
अक्सर मेरे पिताजी से..
सरकारी नौकरी में,
इमानदारी की मिसाल बन,
अपने घर का सपना पालना?
पिताजी उस पहाड़ की ऊँचाई से वाकिफ थे,
पर माँ तो माँ है,
उसके लिए चौतरफा दबाव है,
...कुछ बेच के,
इमानदारी को निचोड़ के,
पुरखों के सपने ख़ाक कर,
एक सरकारी योजनाओं का,
घर ले ही लिया,
मगर जब रहने की बारी आई
तो तबादला और बिमारी लायी,
फिर उस "अपने" घर में ताला लगा,
कुछ बर्तन और कुछ बिस्तर ले,
एक नए शहर में...
सब कुछ "अपने" घर में,
ताले में बंद था,
यहाँ, हर महीने मकान-मालिक.
का "पठान" की तरह आना.
माँ का आश्वासन की कल आना
हर ग्यारह महीने पर,
मकान बदलने की,,
प्रसव-वेदना सा झेलना...
एक तनख्वाह,
ज़मीन पे सोना,
पिताजी और माँ का कहना,
क्या करना है यहाँ कुछ सामान खरीद कर,
कोशिश करिए,
वापस अपने शहर तबादला ले लीजिये,
बाट जोहते तबादले की,
साल दर साल निकलते गए,
माता और पिताजी,
बुढ़ापे की और बढ़ते गए,
मगर अपने घर की आस में,
हम किसी और घर में,
अपने अपने कोने की हिफाज़त करते रहे,
यही सोच, किराए के घर को
नए शहर को,
और उस नए शहर के लोगों को
ये सोच न अपना सके की,
"ये अपना नहीं है",
एक दिन हम "अपने" घर में जायेंगे,
आखिर किराये के मकान में ही,
पिताजी रिटायर हो गए,
दिल में अनेको दर्द लिए,
दिल के ओपरेशन की डगर चल दिए,
फिर 'अपने" घर जाने के इंतज़ार में,
कई साल कौवो को सुन सुन के बिताये,
बात बेटियों की शादी की आई,
"अपने" बेगाने हुए,
तो फिर "अपने" घर की याद आई.
इस बार, उसका दाम लगा,
बिक गया,
बेटी की शादी हुई,
लेकिन माँ का सपना,
अधूरा रहा ,
कुछ साल, और भटक के,
हर ग्यारह महीने में
जड़ से कट कट के...
पिताजी इस दुनिया से उठ गए,
किराए के माकन से ही उनका
जनाज़ा निकला,
माँ आज भी रोती हैं,
मगर किराए के घर की दीवारों के सिवा,
उनके आंसुओं का कोई और,
गवाह नहीं है....
बेटा अभी भी ग्यारह महीने के खौफ्फ़,
में ही जीता है,
माँ, अपने भगवान् की मूर्तियों,
के लिए हर नए किराये के मकान में,
जगह ढूंढ लेती है...
ग्यारह, दस, नौ, आठ….
वो उलटी गिनती,
जो माँ की चिंता का सबब है,
और जो बेटे के माथे की
बढती चौड़ाई से भी,
डरती नहीं है,
वो तो बस घटती जा रही है,
ग्यारह, दस, नौ, आठ…..
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रविवार, 14 फ़रवरी 2010
यमराज ढूढ़ते रहते हैं.....
प्रिय मित्रों से विनम्र निवेदन
प्रिय मित्र,
इस कविता को पढने के बाद, मैं आग्रह करूँगा की आप नीचे कविता के अंत में लिखे दो पौराणिक दृष्टांत को ज़रूर पढ़े, इस से इस कविता के भाव को समझने में आसानी होगी.... आपके सुझाव और आलोचनाओ का का हमेशा की तरह इंतज़ार रहेगा -
आपका शुभेक्छु
वैभव अ. श्रीवास्तव
__________________________________________
यमराज ढूढ़ते रहते हैं....
हम न घर के वासी हैं
न मठ के सन्यासी हैं,
हम मृत्युलोक के नचिकेता* हैं,
अपनों से दुत्कार मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं.....
जीवन अपना शमशान हुआ है,
स्वाभिमान की चिता सजी,
वर्तमान से लड़ने की,
हमको ऐसी सजा मिली,
हम दधिची** बन के भी हारे,
त्याग किया, फटकार मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं.....
हम संस्कार के, मृदु जालों में,
तार-तार हो, बैठ गए,
अभाव आचमन का होने से,
भाग्य-विधाता रूठ गए,
पिए गरल* हमने भी बहुत,
पर नीलकंठ पदवी न मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं..... [*गरल - विष या ज़हर ]
झूठ-कपट सिरमौर बना है,
सत्य सिसकियाँ लेता है,
अर्थ, अनर्थ मचा जाता,
जब पेट हिचकियाँ लेता है,
हरिश्चंद्र आदर्श बना के,
भूख मिली, रोटी न मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं.....
(पौराणिक कहानी )
[1]*नचिकेता - बालक नचिकेता ने जब देखा की उसके पिता बूढी गायों को कसाई को दान दे रहे हैं, तो उसने पिता से पुछा की आप ऐसा क्यों कर रहे है, तो उत्तर मिला की अब ये सब किसी काम की नहीं रह गयी हैं, इसलिए इनको पाल कर इन पर खर्च करना बेकार है, नचिकेता दुखी हुआ और पूछने लगा की पिताजी, अगर कल को मैं किसी काम लायक नहीं बचा तो आप मुझे किसको दान करेंगे, और ये प्रश्न वो उनसे बार बार करता रहा, गुस्से में पिता ने कह दिया "तुझे यमराज को दान कर दूंगा", ये सुन कर बालक घर से निकल कर जंगल में भटकता रहा और यमराज को ढूढता रहा.... यमराज ने उसे दर्शन दिए और उसकी जिज्ञासाओं को शांत किया...
[2]**दधिची - ऋषि दधिची ने अपने पुरखो को तारने के लिए अपने शरीर की हड्डियों तक को दान कर दिया था...
प्रिय मित्र,
इस कविता को पढने के बाद, मैं आग्रह करूँगा की आप नीचे कविता के अंत में लिखे दो पौराणिक दृष्टांत को ज़रूर पढ़े, इस से इस कविता के भाव को समझने में आसानी होगी.... आपके सुझाव और आलोचनाओ का का हमेशा की तरह इंतज़ार रहेगा -
आपका शुभेक्छु
वैभव अ. श्रीवास्तव
__________________________________________
यमराज ढूढ़ते रहते हैं....
हम न घर के वासी हैं
न मठ के सन्यासी हैं,
हम मृत्युलोक के नचिकेता* हैं,
अपनों से दुत्कार मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं.....
जीवन अपना शमशान हुआ है,
स्वाभिमान की चिता सजी,
वर्तमान से लड़ने की,
हमको ऐसी सजा मिली,
हम दधिची** बन के भी हारे,
त्याग किया, फटकार मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं.....
हम संस्कार के, मृदु जालों में,
तार-तार हो, बैठ गए,
अभाव आचमन का होने से,
भाग्य-विधाता रूठ गए,
पिए गरल* हमने भी बहुत,
पर नीलकंठ पदवी न मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं..... [*गरल - विष या ज़हर ]
झूठ-कपट सिरमौर बना है,
सत्य सिसकियाँ लेता है,
अर्थ, अनर्थ मचा जाता,
जब पेट हिचकियाँ लेता है,
हरिश्चंद्र आदर्श बना के,
भूख मिली, रोटी न मिली,
यमराज ढूढ़ते रहते हैं.....
(पौराणिक कहानी )
[1]*नचिकेता - बालक नचिकेता ने जब देखा की उसके पिता बूढी गायों को कसाई को दान दे रहे हैं, तो उसने पिता से पुछा की आप ऐसा क्यों कर रहे है, तो उत्तर मिला की अब ये सब किसी काम की नहीं रह गयी हैं, इसलिए इनको पाल कर इन पर खर्च करना बेकार है, नचिकेता दुखी हुआ और पूछने लगा की पिताजी, अगर कल को मैं किसी काम लायक नहीं बचा तो आप मुझे किसको दान करेंगे, और ये प्रश्न वो उनसे बार बार करता रहा, गुस्से में पिता ने कह दिया "तुझे यमराज को दान कर दूंगा", ये सुन कर बालक घर से निकल कर जंगल में भटकता रहा और यमराज को ढूढता रहा.... यमराज ने उसे दर्शन दिए और उसकी जिज्ञासाओं को शांत किया...
[2]**दधिची - ऋषि दधिची ने अपने पुरखो को तारने के लिए अपने शरीर की हड्डियों तक को दान कर दिया था...
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