दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
(चेतावनी- इस ब्लॉग के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) ब्लॉग के संचालनकर्ता और लेखक वैभव आनन्द के पास सुरक्षित है।)

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

ढाबा

रोज़ 'चित्रों' को,


हम परोसते हैं,

'शब्द' और 'आवाज़' से,

उन्हें छौकते हैं,

छन से आवाज़,

छौंक की होती है,

"क्या यार...ज़रा धीरे से"

बड़े हलवाई चीखते हैं...

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

बदनाम बस्ती: ये प्यासा बड़ा पुराना है...

बदनाम बस्ती: ये प्यासा बड़ा पुराना है...

ये प्यासा बड़ा पुराना है...

हर दिन की वही कहानी थी,
पर रातों का नया फ़साना है,
आँखों से रात को  छलकेगा,
जो अश्क अभी अंजाना है ...
मुझे रात ही अपनी लगती है,
तारों का लश्कर भाता है,
उसे रात ही मुझमे घुलना है,
दिन में बस नज़र चुराना है..
जिसे मैंने बड़ा संभाला है,
वो जज्बातों का दरिया है,
लहरों  से हूक निकलती है,
पर वो इस से बेगाना है...
वो पास से गुज़रे,आस जगा दे,
न दिक्खे उम्मीद भुला दे,
नीम नशा कैसा है ये,
इसे कैसे दिल से हटाना है?
एक बार वही दिल धड़का है,
जिसे मैंने कभी भुलाया था,,
फिर धड़कन नयी नयी सी है,
फिर दिल का वही बहाना है..
इस बार इसे जी लेने दो,
इस बार इसे पी लेने दो,
मत छीनो इससे,इसके प्याले,
ये प्यासा बड़ा पुराना है...

सोमवार, 20 सितंबर 2010

फिर भी इक ये टीस है

एक पुराना सा था जो, सम्बन्ध वो भी ख़त्म हुआ,
जैसे दिल के कमरों से गर्द-ओ-गुबार हट गया.

खिड़कियाँ फिर खोल मन की निहारने बैठा हूँ सब,
आज फिर से धूप का टुकड़ा नया सा भर गया.

अटका हुआ था एक खटका, रोकता जुबान था,
आज ढंग  से उसको  सुपुर्द, काग़ज़ों के कर दिया.

अब वहां काग़ज़ दबा हैं  इबारतों के बीच में,
'और मैं, आराम से हूँ', ख़त में मैंने लिख दिया.

अब मैं चाहे जो करूँ आज़ाद हूँ सब बन्धनों से,
फिर भी इक ये टीस है, की, बेहद अकेला हो गया.

तनहईयों की सारी ही  फेहरिस्त अब ग़ुम हो गई,
मजमून लेकिन था कुछ ऐसा की मझमे वो घर कर गया.



गुरुवार, 16 सितंबर 2010

जिस नूर से रोशन था मैं...

मैं ही निशाना हो गया...
इस जहाँ की बंदिशों में, क़ैद हो कर रह गया,
चाहता था गुनगुनाना, सरगमो में खो गया.


है कई नश्तर ज़माने की गिरहबानो में, मगर,

हर किसी का एक मैं ही, क्यों निशाना हो गया.


एक परिंदा दिल था वो भी, उड़ चला गुमनाम सा,
राह के पत्थर से यारी, कर के  उसपे सो गया.


मिन्नत बहुत की उस से लेकिन, वो भी कुछ मजबूर था,
और फिर कुछ यूँ  हुआ, वो कारवां में खो गया.


थी बड़ी ये आरज़ू की मिल सकूं एक बार उस से,
पर जुबान कैसे ये कहती, "जो हो गया-सो हो गया".


अब न कोई राहतें, राह में मेरे बची,
जिस नूर से रोशन था मैं, बेसुध सा वो ही सो गया.


है येही उम्मीद बस की एक दिन वो ये कहेगा,
"मै तेरे जैसे से क्यूँ बेगाना सा हो गया" ?