दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
(चेतावनी- इस ब्लॉग के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) ब्लॉग के संचालनकर्ता और लेखक वैभव आनन्द के पास सुरक्षित है।)

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

आँखों से आँखों का हाल पूछना है

आँखों से आँखों का हाल पूछना है ...
कैसे करती हो ये कमाल?
बाकी है जो दिल में वो मलाल पूछना है ...
 
आँखे झुकती हैं तो हया भी गश खाती है,
कैसे करती हो ये कमाल? पूछना है 
 
कैसे हो जाती है पूरी तुम्हारी मन्नते सारी?
दुआ में उठती उन आँखों का जलाल पूछना है ...
 
मेरी याद में जब आँखें बहाती हैं आंसू , 
तब  होता है दिल कितना बेहाल? पूछना है ...
 
पूछना है ये, वो भी पूछना है, 
कैसे गुज़ारा इतना साल? पूछना है...
 

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

स्वास्तिका : गंगा की बेटी गंगा के हवाले

रोती गंगा, रोते घाट....
"चलो रे डोली उठाओ कहार, पिया मिलन की रुत आई....
६ साल की स्वस्तिका के लिए इस गाने का मतलब थोडा अलग है... उसकी डोली वो पत्थर है जिस से उसके बेजान शरीर को बंधा गया, और उसके पिया वो भगवान हैं जिनसे उसका आज मिलन हुआ... अगर महसूस कर सको तो उस बाप की वेदना महसूस करो, जो उसे गोद में उठा कर अंतिम संस्कार को ले आया... ६ साल की बेटी का भार उसके लिए नया नहीं है, ऐसा ही भार उसके सो जाने पर अक्सर महसूस करता था ये अभागा बाप, मगर अब उसके उठने का इंतज़ार किसी को नहीं है....जिन घाटो पर वो खेल के बड़ी हुई, जिन घाटों को उसके ब्याह की शहनाइयां सुननी थी... वो आज उसकी मौत की गवाह बन गयी...कल बनारस के घाट पर एक विस्फोट हुआ और स्वस्तिका की मौत की वजह बन गया..   गंगा मौन है, मगर गंगा की धारा की चीत्कार और सिसकियों के स्वर हर कोई महसूस कर रहा है...
किसने किया और किसने कराया ये बम विस्फोट? जांच होगी और पता चल जायेगा, मगर स्वस्तिका का बाप हर रोज़ घाट पर आएगा... इस उम्मीद में की शायद आज उसे यहीं कहीं खेलती स्वस्तिका मिल जाए..
इस बम विस्फोट पर मुझे कुछ नहीं कहना.. और न ही सरकार-प्रशासन पर ही कोई टिपण्णी करनी है.. आज तो बस देश में कश्मीर और देश की सीमाओं से आगे आकर  गहरे तक पैठ बना चुके आतंकवाद पर  मुझे मशहूर लेखक शिव खेडा की वो बात याद आ रही है... "अगर आप के पडोसी पर अन्याय हो रहा है, और आप चुप होकर घर में बैठ जाते हैं, तो यकीन मानिये, कल आपका ही नंबर है..."  क्या स्वास्तिका के पिता श्री संतोष कुमार शर्मा के पडोसी और हम सब ये समझ पा रहे हैं?

रविवार, 28 नवंबर 2010

बदनाम बस्ती: बहुत याद आतें हैं, बीते हुए पल

बदनाम बस्ती: बहुत याद आतें हैं, बीते हुए पल

बहुत याद आतें हैं, बीते हुए पल

बहुत याद आतें हैं,
बीते हुए पल.

वो नज़रें, जिसे ढूढती थीं हमेशा,
वो पाने की चाहत, छुपाना हमेशा,
अनजान बनके, सुनाना हमेशा,
मीर-ग़ालिब की कोई प्यारी ग़ज़ल.

बहुत याद आतें हैं,
बीते हुए पल.

आंगन में लेटे हुए रात को,
चाँद से रोज़ मिन्नत, करें रात को,
'पहुंचा दे, दिल की सदा रात को',
प्रेम-प्रश्नों से बिछड़ा था, हर एक हल.

बहुत याद आतें हैं,
बीते हुए पल.

किताबों के लफ़्ज़ों से, खट्टी फिर मिट्ठी,
लोरियों जैसी माँ की, वो सोंधी सी मिटटी,
बगिया में बीते, ज्यों गर्मी की छुट्टी,
खेल रातों में, बिस्तर की अदला-बदल.

बहुत याद आतें हैं,
बीते हुए पल.

हमारे बुजुर्गों की, टोली-ठिठोली,
रंगीन और, मीठी-मीठी सी होली,
मिश्री सी उसपे, वो अवधी की बोली,
छौंक उसमे खड़ी बोली, का था शगल.

बहुत याद आतें हैं,
बीते हुए पल.

पिताजी की गोदी में, छुपना-सहमना,
वहीँ लेटे-लेटे, ध्रुवतारा तकना,
परछाइयों का रोज़, शक्लें बदलना,
तब शंखो-अजानो के सुर थे युगल.

बहुत याद आतें हैं,
बीते हुए पल.


रविवार, 24 अक्टूबर 2010

किस्मत के हर्फ

भीगी आँखें अश्को से       अब कहाँ होती है,
वो मेरी किस्मत के हर्फों से    बयां होती है...

वो मेरा था जिसे तुमने        उसको दे दिया,
हर बार येही एक शिकायत खुदा से होती है..

अभी और भी है राहें           तू चुन तो सही,
हर हार के बाद बस ये ही दिलासा होती है...

हैं पेंचो ख़म बहुत इस       आँख मिचौली में,
अब तो ये एक आदत            जैसी होती है...

तमाम उम्र एक फिकरे से परेशान रहे, अब,
उसी फिकरे में ढली अपनी जुबान होती है...

कमीन लोग यहाँ       मीठे खंजर रखते हैं,पर
उन्ही से दोस्ती, आजकल मिलकियत होती है...

वो आंसुओं में भीगी     चिठ्ठी मुझे लिखता है,
मगर वो हमेशा        मुझ तक नहीं पहुँचती है...