मंगलवार, 14 अप्रैल 2015
दिल क्यूं दीवाना हुआ?
ये तो सोचो कि दिल क्यूं दीवाना हुआ
मौत के वक्त वो सामने थे खड़े,
पत्थरों पे तो गुलशन हैं सजते नहीं,
बुधवार, 3 दिसंबर 2014
यही है रे जीवन...
ये वक़्त है
एक घोड़ा-गाड़ी
भागता है - रुकता है
धीमा हो जाता है
घोड़े के गले में बंधे घुँघरू
तब भी खनकते हैं
जब गाड़ी बिलकुल रुकी होती है
वक़्त चले-रुके या बदले
जीवन संगीत नहीं रुकता
घोड़े के गले के घुँघरू
यही कहते हैं
छन-छन, बीतेगा हर छण यूँ ही
मत सोच क़ाफ़िला निकल गया
बस अपनी रफ़्तार बढ़ा
हौले से फिर हाँक जीवन की गाड़ी
सुनता जा घुँघरू की छन-छन...
यही है रे जीवन।
गुरुवार, 20 नवंबर 2014
मौत का था तमाशा...
पत्थरों पे लिखे गए, जो गीत, सब अमर हुए,
काग़ज़ी थी प्रीत अपनी, तो अश्कों में हर्फ़ बह गए।
मौत का था वो तमाशा, महज बन सके तमाशबीन,
परदा गिरा तो होश आया, किसको हम दफना गए।
वो गया, तो ले गया, बहार-ए-चमन साथ में,
हम बेबसी से बस, इलज़ाम-ए-क़िस्मत धर गए।
वो जिसे कल ही तो लाये थे घर, बड़े अरमान से,
आज तस्वीरों में हम बस, उसको समेटे रह गए।
कारवां कुछ यूं लुटा , ख्वाबों सी मखमल राह पर,
अब किस क़दम पे मौत है, हम सोचते ही रह गए।
मंगलवार, 24 जून 2014
उस दिन से आज तक
उस दिन यूँ ही,
उसने तुम्हारा नाम,
मेरी हथेली पे लिख दिया,
दुनिया से छुपाने के वास्ते,
मैंने बहुत देर तक,
अपनी मुठ्ठी नहीं खोली,
पता नहीं कब...?
तुम पसीने में घुल गई,बह गयी,
मेरी हथेली की बंदिशों से..
आज भी जब हथेली को..
मैं छूता हूँ,
एक खलिश दिल में
कहीं बहुत गहरे होती है...
तुम्हारा चमकता सा..
धूप में लाल हुआ चेहरा
बहुत देर तक
मेरे 'काले-सफ़ेद' ख्यालों में
'लाल रंग' भरता है,
तुम्हारी कशिश
जो आज तक
ताज़ा है ज़ेहन में...
सुना है लोगों से
बरसों बाद आज भी
वो चमक
जस की तस है?
शायद इसलिए,
की
तुम अनजान हो
मेरी हालत से...
मगर
मेरे जीने का
तो बस
इक यही सहारा है
-------------------
(C) - वैभव आनंद
सोमवार, 14 अक्टूबर 2013
इस 'कमीनी' धूप से...!!
डस रहा था बनके काला नाग भ्रष्टाचार जब,
और कुदरत कर रही थी जम के हाहाकार जब,
ले रही थी निज उमंगें इक नया आकार तब,
कुछ बदलने, और कुछ, बेहतरी की आस में,
मैंने देखा स्वप्न इक, खोल आँखें जाग तब!!
स्वप्न था वो, या हकीकत थी, मेरे एहसास की,
कुछ न कर पाने की वो, अनकहे उन्माद की,
तब बड़े ही ध्यान से मैंने उन्हें देखा पलट कर,
वो थी इक पुस्तक पुरानी मेरे ही इतिहास की!!
इतिहास खोला, तो ये जाना, क्या बिताई ज़िन्दगी?
मौत से बदतर, नरक के ताप सी थी ज़िन्दगी,
अब बदलना ही पड़ेगा इस बुरे इतिहास को,
और बनानी ही पड़ेगी उदहारणों सी ज़िन्दगी!!
और कितना वो छलेंगे अपने छद्म रसूख से,
हम लड़ेंगे कब तलक चिर पुरानी भूख से,
अब नए युग गान खातिर रचना है एक गीत फिर,
आओ मांगें छाह थोड़ी, इस 'कमीनी' धूप से!!
रोज़ दो-दो हाथ करते मौत से रोटी की खातिर,
लूट लेते आधी रोटी 'सत्ता के दलाल' शातिर,
सत्ता नहीं सौंपेंगे इन शातिरों के 'हाथ' अब,
मेरे-तुम्हारे आज, सबके मुस्तकबिल की खातिर!!
आओ ज़रा ये प्रण करें हाथों में हाथ थाम कर,
फूंक हम सबका ये घर, न कर सकें अट्टहास अब!!
कुछ बदलने, और कुछ, बेहतरी की आस में,
मैंने देखा स्वप्न इक, खोल आँखें जाग तब!!
और कुदरत कर रही थी जम के हाहाकार जब,
ले रही थी निज उमंगें इक नया आकार तब,
कुछ बदलने, और कुछ, बेहतरी की आस में,
मैंने देखा स्वप्न इक, खोल आँखें जाग तब!!
स्वप्न था वो, या हकीकत थी, मेरे एहसास की,
कुछ न कर पाने की वो, अनकहे उन्माद की,
तब बड़े ही ध्यान से मैंने उन्हें देखा पलट कर,
वो थी इक पुस्तक पुरानी मेरे ही इतिहास की!!
इतिहास खोला, तो ये जाना, क्या बिताई ज़िन्दगी?
मौत से बदतर, नरक के ताप सी थी ज़िन्दगी,
अब बदलना ही पड़ेगा इस बुरे इतिहास को,
और बनानी ही पड़ेगी उदहारणों सी ज़िन्दगी!!
और कितना वो छलेंगे अपने छद्म रसूख से,
हम लड़ेंगे कब तलक चिर पुरानी भूख से,
अब नए युग गान खातिर रचना है एक गीत फिर,
आओ मांगें छाह थोड़ी, इस 'कमीनी' धूप से!!
रोज़ दो-दो हाथ करते मौत से रोटी की खातिर,
लूट लेते आधी रोटी 'सत्ता के दलाल' शातिर,
सत्ता नहीं सौंपेंगे इन शातिरों के 'हाथ' अब,
मेरे-तुम्हारे आज, सबके मुस्तकबिल की खातिर!!
आओ ज़रा ये प्रण करें हाथों में हाथ थाम कर,
फूंक हम सबका ये घर, न कर सकें अट्टहास अब!!
कुछ बदलने, और कुछ, बेहतरी की आस में,
मैंने देखा स्वप्न इक, खोल आँखें जाग तब!!
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