सलमान खान की "दबंग" ओमकारा का नया संस्करण है. गुलज़ार और विशाल भरद्वाज को इन फिल्मो पर केस कर देना चाहिए. दुःख इस बात का भी है की दर्शकों की भूलने की प्रवृत्ति बहुत तेज़ है और इस फिल्म को खूब दर्शक मिल रहे हैं. शायद इसका एक कारण, वो बेहद फूहड़ और अश्लील, जिसे गीत कहना भी गीतों की तौहीन होगी, हाँ! भांडगिरी कह सकते हैं, "मुन्नी बदनाम हुई" है.
हद तो ये है की ओमकारा की हूबहू नक़ल इसका शीर्षक गीत "दम दबंग दबंग" है. जिसकी धुन ओमकारा से मिलती जुलती है. गायक भी सुखविंदर सिंह हैं. कहानी और उसको कहने का अंदाज़ भी ओमकारा की नक़ल मात्र है. दबंग अनुभव कश्यप की है तो इस मामले में अनुराग कश्यप भी पीछे नहीं हैं, उन की फिल्म देव डी मणिरत्नम की युवा की कहानी बताने की तर्ज पे थी. तो गुलाल, ओमकारा और हासिल का मिश्रण. बेहद चालाकी से इनके प्रोमो बनाते हैं ये नकलची बन्दर जैसे निर्देशक, और फिल्म देख के अपना सर फोड़ने का मन करता है. वैसे नक़ल में राजकुमार हिरानी भी पीछे नहीं. उनकी दो फिल्म क्या हिट हुई तीसरी में उन्ही दोनों के तडके को मिक्स कर परोस दिया, क्योंकि वो जानते थे की केवल 3 idiots ही इंडिया में नहीं हैं, बल्कि करोड़ों की फ़ौज है जो रुपये खर्च करके भी बासी कढ़ी खाने को उतावली रहती है. तो अगर दबंग को करोड़ों का बिजनेस मिल रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं. हमारे दर्शक ही मूर्ख है. जिन्हें पहले राजनेता बेवकूफ बनाते हैं और फिर फिल्म निर्माता से ले कर साबुन निर्माता तक.
यानी हर जगह बेवक़ूफ़ जनता और दर्शक ही बनते हैं. वाकई ये हमारे लिए महा-त्रासदी का दौर है.
रविवार, 12 सितंबर 2010
शनिवार, 21 अगस्त 2010
बंदरों से बचाओ
बन्दर के हाथ,
उस्तूरे की फांस,
अटकी है,
हजामत कराने वालों की सांस,
छुडाए कैसे अपनी गर्दन,
हर कोई सोचता बैठा है,
मगर कितनी दफा,
यहाँ तो हर राह, पे,
उस्तुरा चमकाता,
...एक बन्दर बैठा है.
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
आमिर का कूड़ा, अनुषा की गालियाँ
पिप्पली लाइव की चर्चा हर कहीं हैं... मगर मुझे उस नौजवान दर्शक की टिपण्णी याद आ रही है जो फिल्म ख़तम होने के बाद ये कहता निकल रहा था, "मज़ा आया, बहुत अच्छी कॉमेडी थी..." पहले जिस तरह हम आदिवासिय्यों के अर्ध-नग्न पोस्टर्स से घर सजाते थे, और उसे कला का नमूना मानते थे, ठीक वैसे ही आज हमारे गाँव और वहां की समस्याएं हमारे घर सजाने का सामान और कॉमेडी की भरपाई का यंत्र बन गए हैं.
आमिर खान ने माल संस्कृति के दर्शको के लिए पिप्पली लाइव बनायी, और मल्टीप्लेक्स का दर्शक इसकी गंभीरता को दरकिनार करते हुए इसपे हँसता हुआ मनोरंजन का मसाला समझ देख रहा है. नत्था की बेबसी पर उसे हंसी छूट रही है. बुधिया की गालियों को वो बड़े प्यार से सुन रहा है...
गालियाँ उसे फिल्म से जोड़ रही हैं... मगर सवाल ये है की क्या इतने गंभीर विषय को देखने और समझने की ताकत मल्टीप्लेक्स के दर्शको की है?
फिल्म की बात करें तो इसमें नया कुछ भी नहीं है. फिल्म की कहानी अनुषा ने मुंशी प्रेमचंद की "कफ़न" से चुरा ली है, जहाँ बीवी के लिए कफ़न खरीदने गए दोनों पात्र दारु में टल्ली हो झूमते हैं और बीवी अन्दर तड़प तड़प के मर जाती है... फिल्म में अनुषा ने राज कपूर की "तीसरी कसम" की तरह गीत डाल दिया, उसमे "चलत मुसाफिर था... , इसमें "महंगाई डायन...." है ...
विशाल भारद्वाज की "ओमकारा" की तरह बेवजह की गालियाँ हैं.. और "मैं आज़ाद हूँ" की तरह मीडिया की लड़ाई और नायक के मरने की खबर का फायदा उठाते नेता और सरकार...
मीडिया के एक "दम्पति पत्रकार" (राधिका और प्रणव रॉय) को फिल्म की शुरुआत में धन्यवाद दिया गया है, जिसने की फिल्म में संसाधन उपलब्ध कराये होंगे, तो साहब वो कैसे पीछे रहते, लगे हांथों उन्होंने एक "ख़ास" न्यूज़ चैनल (स्टार)के एक "ख़ास" रिपोर्टर (दीपक चौरसिया)पर "खुन्नस" निकाल डाली है...
इतने गंभीर विषय को अच्छा ख़ासा मज़ाक बना दिया है आमिर खान ने, अब वो अपनी फिल्म की नुमाइश दुनिया भर में करेंगे "इंडिया सर ये चीज़ धुरंधर..." की रटन लगायेंगे और हो सकता है, इस बार वो "लगान" से ज्यादा पुरस्कार पा जाएँ...
देश की गन्दगी को शायद आमिर अब पश्चमी देशों में वाहवाही लूटने के लिए ही परदे पर ला रहे हैं...आमिर के लिए उन्ही की इस फिल्म की वो लाइन बिलकुल फिट बैठती है... "जेब दलिद्दर, दिल है समुन्दर..." रुपये कमाने के बाद अब उनका दिल पुरुस्कारों का भूखा है, और भूखा आदमी कुछ भी खाने से नहीं चूकता...
ये हमारी बद्किस्माती है की हम इसे एक फिल्म मान कर बैठ जाते हैं... मगर गौर करने लायक ये है की ये फिल्म नहीं, देश के खिलाफ एक साज़िश है जिसे पूरी शिद्दत के साथ परदे पर उतारा जा रहा है...
आमिर खान ने माल संस्कृति के दर्शको के लिए पिप्पली लाइव बनायी, और मल्टीप्लेक्स का दर्शक इसकी गंभीरता को दरकिनार करते हुए इसपे हँसता हुआ मनोरंजन का मसाला समझ देख रहा है. नत्था की बेबसी पर उसे हंसी छूट रही है. बुधिया की गालियों को वो बड़े प्यार से सुन रहा है...
गालियाँ उसे फिल्म से जोड़ रही हैं... मगर सवाल ये है की क्या इतने गंभीर विषय को देखने और समझने की ताकत मल्टीप्लेक्स के दर्शको की है?
फिल्म की बात करें तो इसमें नया कुछ भी नहीं है. फिल्म की कहानी अनुषा ने मुंशी प्रेमचंद की "कफ़न" से चुरा ली है, जहाँ बीवी के लिए कफ़न खरीदने गए दोनों पात्र दारु में टल्ली हो झूमते हैं और बीवी अन्दर तड़प तड़प के मर जाती है... फिल्म में अनुषा ने राज कपूर की "तीसरी कसम" की तरह गीत डाल दिया, उसमे "चलत मुसाफिर था... , इसमें "महंगाई डायन...." है ...
विशाल भारद्वाज की "ओमकारा" की तरह बेवजह की गालियाँ हैं.. और "मैं आज़ाद हूँ" की तरह मीडिया की लड़ाई और नायक के मरने की खबर का फायदा उठाते नेता और सरकार...
मीडिया के एक "दम्पति पत्रकार" (राधिका और प्रणव रॉय) को फिल्म की शुरुआत में धन्यवाद दिया गया है, जिसने की फिल्म में संसाधन उपलब्ध कराये होंगे, तो साहब वो कैसे पीछे रहते, लगे हांथों उन्होंने एक "ख़ास" न्यूज़ चैनल (स्टार)के एक "ख़ास" रिपोर्टर (दीपक चौरसिया)पर "खुन्नस" निकाल डाली है...
इतने गंभीर विषय को अच्छा ख़ासा मज़ाक बना दिया है आमिर खान ने, अब वो अपनी फिल्म की नुमाइश दुनिया भर में करेंगे "इंडिया सर ये चीज़ धुरंधर..." की रटन लगायेंगे और हो सकता है, इस बार वो "लगान" से ज्यादा पुरस्कार पा जाएँ...
देश की गन्दगी को शायद आमिर अब पश्चमी देशों में वाहवाही लूटने के लिए ही परदे पर ला रहे हैं...आमिर के लिए उन्ही की इस फिल्म की वो लाइन बिलकुल फिट बैठती है... "जेब दलिद्दर, दिल है समुन्दर..." रुपये कमाने के बाद अब उनका दिल पुरुस्कारों का भूखा है, और भूखा आदमी कुछ भी खाने से नहीं चूकता...
ये हमारी बद्किस्माती है की हम इसे एक फिल्म मान कर बैठ जाते हैं... मगर गौर करने लायक ये है की ये फिल्म नहीं, देश के खिलाफ एक साज़िश है जिसे पूरी शिद्दत के साथ परदे पर उतारा जा रहा है...
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
मेरे बचपन का गाँव...
इक मंदिर है, इक मस्जिद है, इक ताल, एक तलैया है,
कुछ पक्के हैं, कुछ कच्चे हैं,
कुछ छोटी बड़ी मड़ैया हैं,
कुछ खेत भी हैं, खलिहान भी हैं,
परधान का बड़ा मकान भी है,
ठंडी, गर्म हवाएँ हैं,
कजरी, चैती बिरहाये हैं,
जोगन भी है, जोबन भी है,
कुछ आहें और सदाएं हैं,
मेरे बचपन का गाँव है ये,
जिसकी कई कथाएँ हैं.
कुछ पक्के हैं, कुछ कच्चे हैं,
कुछ छोटी बड़ी मड़ैया हैं,
कुछ खेत भी हैं, खलिहान भी हैं,
परधान का बड़ा मकान भी है,
ठंडी, गर्म हवाएँ हैं,
कजरी, चैती बिरहाये हैं,
जोगन भी है, जोबन भी है,
कुछ आहें और सदाएं हैं,
मेरे बचपन का गाँव है ये,
जिसकी कई कथाएँ हैं.
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
Less importnt for u, but other's needs that due...
Like a fresh rose,
Like a fresh drop of dew,
U r all new,
Can u tell me, who r u?
Soon I asked this,
To the grass and park…
I wasn’t alone,
In search of some unknown,
Seated on a bench,
Seeing either side’s
Graveyard, which is like my mood,
Compiled with gray tone.
After a bunch of time,
I’ll have to go back,
Take with a fresh air,
And backing like relax track,
And
Like a river moved from
Banks,
Banks,
I too moved from here,
Till tomorrow evening,
This bench and this park’s
Slightly yellowish grass,
Would Play with my,
All thrown sorrows,
And heavy mood,
Like a ping-pong….
Tomorrow,
Will back I,
They both will goose me
With there
Child like eye…
Nothing happened.
Act and lie –
“We don’t use the thrown
Things…Noah…”
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