दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
(चेतावनी- इस ब्लॉग के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) ब्लॉग के संचालनकर्ता और लेखक वैभव आनन्द के पास सुरक्षित है।)

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

आज-कल में सबकी बारी है... !!


फ़िज़ूल कोशिश है अब हाथ मलने की,
जिद तो तेरी ही थी साथ चलने की....

पथरीली राहों पे, दर्द भी है, चुभन भी,
तेरी आदत नहीं गिर के फिर संभलने की...

मुक्तसर उम्र होती है, रौशनी के कीड़ों की,
आज-कल में सबकी बारी है जल के मरने की..

गुलाब तोड़ने में हाथ ज़ख़्मी कर लेता हूँ,
अदा सीखा दो, करीने से फूल चुनने की...

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

टर्राने का मौसम...!



कहतें हैं - बरसात में मेढक टर्राते हैं

अपने अपने तालाब के पानी पर इतराते हैं

 मगर मेढकों के टर्राने का भी एक मौसम होता है

 मगर यहाँ तो बेमौसम भी

 टर्राहट है

 अपने अपने तालाब पर झूठी

 इतराहट है

 बेचने को आतुर हैं कुछ लोग

 ये टर्राहट उसी की छटपटाहट है
कुछ बेच लेंगे

कुछ नहीं बेच पाएंगे
बचा कर सहेज कर रख लेंगे

अगले मौके के इंतज़ार में
मौका मिलने पर थोडा मसाला मिला फिर बेचेंगे

ये खरीद-फरोख्त यूँ ही चलती रहेगी
सबकी दाल अपने अपने हिसाब से गलती रहेगी

हम अपनी संस्कृति के टूटे खँडहर पर
नयी कालोनियां बनायेंगे

अपने निपट बेहूदे फ्लैट में बैठ

मेढक की तरह फिर इतरायेंगे

और हां

ख़ुशी में समवेत टर्राएंगे...



शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

बाबुल से विदा...!


साथ तुम्हारा हाथ तुम्हारा और वादा जीवन भर का!

मांग तेरी सिन्दूर मेरा और सात वचन जीवन भर का!

सम्बन्ध तेरा बंधन मेरा और प्यार निभाना जीवन भर का! 

वादा मेरा कसमें तेरी और उन्हें परखना जीवन भर का! 

मेरी खुशियाँ और आंसूं तेरे बाबुल से विदा जीवन भर का......!

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

अधूरे से हैं हम भी...


बड़ी दुश्वारियां हैं, 
एक सीधी राह चलने में,
                                    तुम्हारे आह भरने में, 
                                    हमारे सांस लेने में.
मगर तुम ये नहीं मानोगी,
 की हम  भी प्यार करते हैं,
                                   बड़ी उम्मीद से हर बार, 
                                   ये इकरार करते हैं,
  है अब भी वक़्त, 
  गर तुम समझ पाओ,
                                  अधूरे से हैं हम भी, 
                                 और अधूरे तुम भी हो लेकिन, 
 यही है प्रश्न, इसका हल, 
 हम कहाँ से ले आये?

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

नहीं आया

हमको हवाओं के संग बहाना नहीं आया

हमको कश्ती को चुपचाप खेना नहीं आया,

वो सब आ गया जो गुनाह था, 

उनकी नज़र में,

मगर उनके पैमानों पे कभी तुलना नहीं आया...