दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
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गुरुवार, 20 नवंबर 2014

मौत का था तमाशा...




पत्थरों पे लिखे गए, जो गीत,           सब अमर हुए, 
काग़ज़ी थी प्रीत अपनी,   तो अश्कों में हर्फ़ बह गए।  


मौत का था वो तमाशा,   महज बन सके तमाशबीन, 
परदा गिरा तो होश आया,  किसको हम दफना गए। 

वो गया, तो ले गया,           बहार-ए-चमन साथ में, 
हम बेबसी से बस,      इलज़ाम-ए-क़िस्मत धर गए।

वो जिसे कल ही तो लाये थे घर,      बड़े अरमान से, 
आज तस्वीरों में हम बस,      उसको समेटे रह गए।  

कारवां कुछ यूं लुटा ,     ख्वाबों सी मखमल राह पर,
अब किस क़दम पे मौत है,    हम सोचते ही रह गए।   

मंगलवार, 24 जून 2014

उस दिन से आज तक

उस दिन यूँ ही, 
उसने तुम्हारा नाम, 
मेरी हथेली पे लिख दिया, 
दुनिया से छुपाने के वास्ते, 
मैंने बहुत देर तक, 
अपनी मुठ्ठी नहीं खोली, 
पता नहीं कब...? 
तुम पसीने में घुल गई,बह गयी, 
मेरी हथेली की बंदिशों से..
आज भी जब हथेली को.. 
मैं छूता हूँ, 
एक खलिश दिल में 
कहीं बहुत गहरे होती है... 
तुम्हारा चमकता सा.. 
धूप में लाल हुआ चेहरा 
बहुत देर तक 
मेरे 'काले-सफ़ेद' ख्यालों में 
'लाल रंग' भरता है,
तुम्हारी कशिश 
जो आज तक 
ताज़ा है ज़ेहन में... 
सुना है लोगों से 
बरसों बाद आज भी 
वो चमक 
जस की तस है? 
शायद इसलिए, 
की 
तुम अनजान हो 
मेरी हालत से... 
मगर 
मेरे जीने का 
तो बस 
इक यही सहारा है 
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(C) - वैभव आनंद


सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

इस 'कमीनी' धूप से...!!

डस रहा था बनके काला नाग भ्रष्टाचार जब, 
और कुदरत कर रही थी जम के हाहाकार जब,
ले रही थी निज उमंगें इक नया आकार तब,  
कुछ बदलने, और कुछ, बेहतरी की आस में, 
मैंने देखा स्वप्न इक, खोल आँखें जाग तब!!

स्वप्न था वो, या हकीकत थी, मेरे एहसास की, 
कुछ न कर पाने की वो, अनकहे उन्माद की, 
तब बड़े ही ध्यान से मैंने उन्हें देखा पलट कर, 
वो  थी इक पुस्तक पुरानी मेरे ही इतिहास की!!   

इतिहास खोला, तो ये जाना, क्या बिताई ज़िन्दगी? 
मौत से बदतर, नरक के ताप सी थी ज़िन्दगी, 
अब बदलना ही पड़ेगा इस बुरे इतिहास को, 
और बनानी ही पड़ेगी उदहारणों सी ज़िन्दगी!!  

और कितना वो छलेंगे अपने छद्म रसूख से, 
हम लड़ेंगे कब तलक चिर पुरानी भूख से,
अब नए युग गान खातिर रचना है एक गीत फिर,  
आओ मांगें छाह थोड़ी, इस 'कमीनी' धूप से!!

रोज़ दो-दो हाथ करते मौत से रोटी की खातिर, 
लूट लेते आधी रोटी 'सत्ता के दलाल' शातिर, 
सत्ता नहीं सौंपेंगे इन शातिरों के 'हाथ' अब,
मेरे-तुम्हारे आज, सबके मुस्तकबिल की खातिर!! 

आओ ज़रा ये प्रण करें हाथों में हाथ थाम कर,
फूंक हम सबका ये घर, न कर सकें अट्टहास अब!!
   
कुछ बदलने, और कुछ, बेहतरी की आस में, 
मैंने देखा स्वप्न इक, खोल आँखें जाग तब!!

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

सिरफिरे अंगार में...?

ये सजा सी गुफ्तगू , शोर है कुतर्क कादायरें में सब बंधे, बेकार रुदन विमर्श का

किसी ने बदले जिल्द पुरानी किताब के
कोई खोल बैठा बही पुराने हिसाब के

कोई भरसक बदल रहा रंग कैनवास के
चढ़ा रहा कोई मुलम्मे  गर्द पे, बकवास के

हर तरफ एक आलम-ए बदहवासी छा रही
पल-पल बदलती सोच में इक उदासी गा रही

अल्फाज़ जैसे कम पड़े हर बार उनकी बात में
दुहरा रही हो खुद को जैसे ज़िन्दगी उन्माद में

बेचने का खेल भौंडा चल रहा बाज़ार में
भस्म होती है जवानी सिरफिरे अंगार में

है पुरानी उनकी सारी बात, लेकिन दंभ है
मुक्तसर ये बात है खुद पे उन्हें घमंड है में 


शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

आज-कल में सबकी बारी है... !!


फ़िज़ूल कोशिश है अब हाथ मलने की,
जिद तो तेरी ही थी साथ चलने की....

पथरीली राहों पे, दर्द भी है, चुभन भी,
तेरी आदत नहीं गिर के फिर संभलने की...

मुक्तसर उम्र होती है, रौशनी के कीड़ों की,
आज-कल में सबकी बारी है जल के मरने की..

गुलाब तोड़ने में हाथ ज़ख़्मी कर लेता हूँ,
अदा सीखा दो, करीने से फूल चुनने की...