दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
(चेतावनी- इस ब्लॉग के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) ब्लॉग के संचालनकर्ता और लेखक वैभव आनन्द के पास सुरक्षित है।)

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

हवा के रुख का मारा वो...

किनारों से टकरा के              समंदर टूट जाता है,
मगर पत्थर पे सर देने से  कब वो बाज आता है।

माना हर कहानी                सच नहीं होती,मगर, 
हर नया किरदार            ज़ेहन में घर बसाता है।


जुदाई क्या है                       ये उनसे ज़रा पूछो,
जिनका कोई अज़ीज़       सफ़र में छूट जाता है।


मुक़ाबिल आईने के                   मैं ही हूं हरदम,
तभी हर बार मुझसे            वो मुंह की खाता है।


उसे हामी मिलेगी                या नकारा जाएगा?
हवा के रुख का मारा वो   ना अब शर्तें लगाता है।


गुरुवार, 25 अगस्त 2016

धरती के खुदा!

मेरे ऊपर भी
एक खुदा है
जो ना जप से
ना तप से
ना भोग से
खुश होता है।
ना नमाज़ उसे भाती है,
ना अज़ान उसे लुभाती है।
उसे रुपयों का भोग चाहिए,
नोटो की गड्डियां
नमाज़ के बदले चाहिए।
मैं उसकी भूख का
तोड़ ढूढ़ने निकला था,
मगर सारे रास्ते
रुपयों पे जाके
खत्म होने लगते हैं।
किस्मत का लिखा,
पढ़ने वालों के पास भी गया
वहां भी वही खुदा है।
बच्चे की दवा लेने गया
वहां भी उसी की सत्ता है।
घर का राशन भी
खुदा को
खुश करके ही मिलता है।.
इन खुदाओं को खुश
करते-करते
मैं थक गया हूं...
मरना चाहता हूं...
मगर ये जानता हूं
कि, शमशान में भी
खुदा है,
जिसे परिजनों को
मुझे जलाने से पहले
खुश करना होगा
खैर मुझे क्या
मैं तो तब तक
आज़ाद हो चुका होऊंगा
धरती के तमाम खुदाओं
और उनकी

रुपयों की भूख से...।

शनिवार, 20 अगस्त 2016

मैं कौन हूं?

उसकी यादों से         गुज़र आया मैं
तमाम खुश्बुओं से       नहा आया मैं।

वो अपने रस्ते        जा चुका कब का
उन्हीं रास्तों से      हाल पूछ आया मैं।

कुहुक उठती थी     जिस राग में कोयल
उन्हीं रागों को  वादियों से चुरा लाया मैं।

इक कचहरी खुली थी     फैसले के लिए
वहां सारी तकरीरें  खोखली कर आया मैं।

शहर जो इतराता था     अपने अदब पर
उसी शहर से    सारे अदब उड़ा लाया मैं।

बस वजीर से ही आस थी   उन्हें खेल में
उसे अपने प्यादे से       पीट आया मैं।

चौरासी खंभे थे     जिनकी पहचान कभी
उन खंभों की हकीकत बयां कर आया मैं।

इतना सब करके भी   जब मन ना भरा
पाबंदीशुदा सारे      नारे लगा आया मैं।


गुरुवार, 18 अगस्त 2016

मेढकों को 'मुंह' कौन लगाता है

वो, हर उस खेल में,
मुझसे जीत जाता है
जहां उसे 'खुद' को उठाना,
मुझे गिराना आता है।

हूं परेशान,                
मैं अपनी हालत पर
जिसपे दुनिया को हंसना,      
मुझे रोना आता है। 

वो मेरा 'शागिर्द' था,              
अब 'सीख' गया है
तमाम चालें,   
जिसे सोच 
'जिस्म' कांप जाता है।

उसकी हर मात का                      
क्या काट लाऊं,
ये बुरा ख्वाब मुझे रोज़                 
जगा जाता है।

नामालूम कैसी सोच है                 
आज लोगो में
इक सिरा थामता हूं,             
दूजा छूट जाता है। 

पीछे छूट चुके                          
तमाम लम्हों का,
आईना रोज़                        
हिसाब मांग जाता है।

कुएं में कुछ दिन बिताना         
मेरी मज़बूरी है
वरना मेढकों को              
' मुंह' कौन लगाता है?  

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

दुनिया फतह का सपना...

तुम्हारी सोच
एक दिन
मैं बदल दूंगा।
तुम्हारे दिमाग में
मैं अपनी सोच के
'पारे' भर दूंगा।
बिना नारों
बिना वादों के।
बस थोड़ी सी
'चिंगारी' उठने का
इंतज़ार करो।
उस से मैं
'आग' जलाऊंगा

तब पका दूंगा...
'घालमेल की खिचड़ी'
और फिर तुम
जनम-जनम से भूखे
किसी 'कुत्ते' की माफिक
जीभ लपलपाते आओगे
बन जाओगे मेरे 'चारण'
और फिर
मेरे ही 'सुर' में
तुम भी गाओगे।
अगली 'खिचड़ी' की आस में...
चाटने लगोगे मेरे तलवे।
उस दिन मैं...

हां! ठीक उसी दिन से
दुनिया फतह करने का
सपना देखना
शुरु कर दूंगा।