बदनाम बस्ती...!
क्यों कोसते हो शहर की बदनाम गलियों को, यहां हर मोड़ पर एक "बदनाम बस्ती" है...
दिल की नज़र से....
(चेतावनी- इस ब्लॉग के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) ब्लॉग के संचालनकर्ता और लेखक वैभव आनन्द के पास सुरक्षित है।)
रेत पे रोज़ लिखता है...
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शनिवार, 6 अगस्त 2016
रेत पे रोज़ लिखता है...
गिरता है
संभलता है
फिर उठ के
चलता है...
ये इंसान
कहां सुनता है
स्वंयभू राजा है
मनमानी करता है
टूटते हैं रोज़
पर रोज़
ख़्वाब
बुनता है
रोता है
,
कोसता है
,
फिर
हंस के
मिलता है
नादान
किसी बच्चे सा
रोज़ ही
बहलता है
आभावों से
दोस्ती की
फितरत
बनाता है
रेत पे
रोज़
लिखता है
जो पल में
मिट जाता है
जिद्दी है वो
दोबारा लिखने को
हर रोज़
आता है
ये इंसान
कहां सुनता है।
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