माना की इक चिराग भी मयस्सर नहीं, मेरी मज़ार पे,
पर एहसान कर गए वो, मुझे इनके बीच दफना के...
दिल को ये तस्सल्ली , हर रोज़ दे रहा हूँ,
सब पड़े है, एक नापसंद को पहलू में अपना के..
बाद मरने के ही सही, हमसायों के कद तो आ गया,
पछता रहे ,वो भी, शहरे-खामोशा के दस्तूर बना के....
सफ़ेद संगेमरमर से रोशन है कब्र उनकी,
पर खुश हूँ मै तो अपने पे गुलदार उगा के...
लाख वो निसार बार-बार हों अपने चिराग पे,
पर वो भी खौफज़दा हैं , स्याह मिट्टी में समां के....
ता-उम्र जब भी गुज़र गए वो सामने से मेरे,
ज़ख़्मी हुआ दिल उनकी हिकारत के वार पे....
अब वो भी हैं यहीं, हम भी हैं काबिज़ यहाँ पर,
अफ़सोस की सब लौट गए, एक कड़वी सच्चाई दफना के ...
इतरा रहे हो आज अपने रसूख पे, कल तुम भी आओगे,
कहाँ निकल सका है कोई, इस बस्ती से मुह चुरा के..
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
ज़रूरतें जवां हैं ...
मेरी जुबां पे चुप है, है उसकी जुबां पे ना है ,
मै उससे जीत जाऊँ ,मेरी औकात ही कहाँ है....
वो सोचता है महंगा, मुझको खरीदना है ,
कैसे उसे बताऊँ , की ज़रूरतें जवां हैं ...
पर आदमियत मेरी, रोकती जुबां है,
कैसे दिखाऊं उसको की, पैबंद कहाँ-कहाँ है....
इस रात की सियाही में, सब हर्फ खो गयें है,
हाले-दिल सुनाऊं, वो मज़मून ही कहाँ हैं....
है रफ्ता-रफ्ता बेहद, ज़िन्दगी का ये तमाशा,
बीच में लूँ रुखसत, वो मिजाज़ गुम यहाँ हैं..
इंतज़ार फिर भी उसके इक नूर का ही है,
जिसमे हो साफ़ ये की मेरी किस्मत में क्या कहाँ है....
मै उससे जीत जाऊँ ,मेरी औकात ही कहाँ है....
वो सोचता है महंगा, मुझको खरीदना है ,
कैसे उसे बताऊँ , की ज़रूरतें जवां हैं ...
पर आदमियत मेरी, रोकती जुबां है,
कैसे दिखाऊं उसको की, पैबंद कहाँ-कहाँ है....
इस रात की सियाही में, सब हर्फ खो गयें है,
हाले-दिल सुनाऊं, वो मज़मून ही कहाँ हैं....
है रफ्ता-रफ्ता बेहद, ज़िन्दगी का ये तमाशा,
बीच में लूँ रुखसत, वो मिजाज़ गुम यहाँ हैं..
इंतज़ार फिर भी उसके इक नूर का ही है,
जिसमे हो साफ़ ये की मेरी किस्मत में क्या कहाँ है....
रविवार, 18 अक्टूबर 2009
नादान हूँ पर अनजान नहीं हूँ
माना की आज की तेज़ दुनिया में हमारा योगदान नहीं है.... तुम्हारे लिए हम नादान सही, पर हम अनजान नहीं हैं, छोटे से घर के हिस्से में पड़े रहते हैं तो क्या, आखिर हम इंसान है, सामान नहीं हैं..... मत भूलो की हमने जवानी में ८४' के दंगे देखे थे, और जिस दिन रिटायर हुए थे, जलते हुए उपहार सिनेमा के ठीक सामने से गुजरे थे, आज भी याद है वो चीख, जब ८७' में अंसल भवन में आग का तांडव हुआ था, कितनो ने ही जान बचने की खातिर, छलांग लगा दी थी, हम ठीक उसी ईमारत के पास मूंगफली चबा रहे थे.... बहुत कुछ देखा है मैंने ज़िन्दगी में, बस अफ़सोस ये ही है की तुम लोग, मेरा दर्द नहीं जान पाओगे... दर्द उस टीस का , की मैंने तुम लोगों की खातिर ही, इतना सब होने के बावजूद, लोगों की मदद नहीं की... मुझे खुद के एक सामन की तरह कोने में पड़े रहने का उतना अफ़सोस नहीं है, जितना की तुम बच्चो के लिए खुद को इंसानियत से हमेशा महरूम रखने का है, वो भी किसके लिए ? ताकि मैं बचा रहूँ अपने परिवार के लिए.... इसीलिए कहता हूँ, नादान हूँ पर अनजान नहीं हूँ, इंसान हूं कोने में पड़ा सामान नहीं हूँ...
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
क्या कहना....
क्या कहना है, उफ़! मुस्कानों का,
जो खुल के जज़्बात दिखाती हैं...
पर अक्सर ये दर्द के ,
माने बन होठ पे आती है...
क्या राज़ छुपा मुस्कानों में ,
ये बतला दो मुझको भी,
थोडा भी दिल के पास हूँ तो ,
अपना लो झट से मुझको भी ....
क्या कहना....
क्या कहना है, उफ़! मुस्कानों का,
जो खुल के जज़्बात दिखाती हैं...
पर अक्सर ये दर्द के ,
माने बन होठ पे आती है...
क्या राज़ छुपा मुस्कानों में ,
ये बतला दो मुझको भी,
थोडा भी दिल के पास हूँ तो ,
अपना लो झट से मुझको भी ....
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