दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
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शनिवार, 6 अगस्त 2016

रेत पे रोज़ लिखता है...

गिरता है
संभलता है
फिर उठ के
चलता है...
ये इंसान
कहां सुनता है
स्वंयभू राजा है
मनमानी करता है
टूटते हैं रोज़ 
पर रोज़ ख़्वाब 
बुनता है
रोता है,
कोसता है,
फिर हंस के 
मिलता है
नादान
किसी बच्चे सा 
रोज़ ही बहलता है
आभावों से दोस्ती की
फितरत बनाता है 
रेत पे रोज़ 
लिखता है
जो पल में
मिट जाता है
जिद्दी है वो
दोबारा लिखने को
हर रोज़ 
आता है
ये इंसान
कहां सुनता है।

गला कटवाने के बाद....

आंकड़ों में बदल जाती हैं
वारदातें...
कुछ दिनों के बाद...
इतिहास बन जाती हैं
वारदातें...
कुछेक सालों बाद...
ना आंकड़ें बदलते हैं
ना ही इतिहास...
मरते जाते हैं मासूम...
एक-एक के बाद।
ये आलम-ए-वहशत है
जिसे ना खत्म होना है...
मान बैठते हैं हम
हर एक 
हादसे के बाद...
सियासत के खेल में
पिसता है मासूम
सियासी लोग 
अपने को बचा लेते हैं
थोथे बयानों के बाद...
वो जिसकी तामीर हुई
नफ़रती बुनियाद पर
उसे फिर गले लगा लेते हैं
हर बार
गले कटवाने के बाद...।

शनिवार, 30 जुलाई 2016

इक पल न लगा....

मुद्दतें लगीं तेरी         नज़र-ए-इनायत पाने में
तुझे इक पल ना लगा मुझे नज़रों से गिराने में


सवाल था       उम्र भर साथ निभाने का
तू तो बिखर गया एक रिश्ता निभाने में


तेरी आदत कुछ इस क़दर मुझपे तारी थी...
अब तलक उलझा हूं, तलाक लफ्ज़ के मायने में

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

...क्योंकि हम 'मौन' हैं....


वो मुखर हैं, अपने हथियारों के साथ
क्योंकि हम 'मौन' हैं...
वो आमादा हैं हमें मारने पर....
क्योंकि हम 'कौन' हैं...
वो कुछ भी कर सकते हैं...
क्योंकि उनके लिए 
सब कुछ 'कौम' है
ये युद्ध है - 
'पांडवों' और 'कौरवों' के बीच
हम ये तो जानते हैं कि 
हम 'पांडव' हैं....
मगर इस समर में
'कृष्ण' कौन है.....
उनके पास भीष्म हैं
'मज़हब' के सिंहासन से बंधे हुए...
मगर अपने पाले में
'शिखंडी' कौन है...
हमें या तो 'कृष्ण' चाहिए
या 'शिखंडी'
इस पर सोचने का वक्त है....
मगर हम 'मौन' हैं
ये 'मौन' बहुत भारी पड़ेगा
छोड़ो सारी बातें
आ जाओ मैदान में
बना लो दो पाले
जहां एक तरफ 
'कौम' है
और दूसरी तरफ 
'कौन' हैं
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रविवार, 14 जून 2015

मिस टनकपुर,ज्यामिति का एक सवाल उर्फ़ विनोद कापड़ी की 'मस्तराम-गाथा'

प्रश्न - सिद्ध कीजिए कि विनोद कापड़ी की फिल्म "मिस टनकपुर हाज़िर हों" की रिलीज़ के बाद फिल्मों का नया इतिहास लिखा जाएगा, कापड़ी के टीवी में फैलाये कचरे की तरह ही एक नया ट्रेंड मार्केट में गोते लगाएगा और 'खाप' के त्रिभुज की 2  भुजाएं (शाहरुख़जैसी) बराबर फैलेंगी और 1 भुजा के शीर्ष पर (माथे पर) अपराध बोध बल खाएगा, कोण किसी भी दिशा में जाएगा.. पर अक्ष (खाप) 360 डिग्री तक घूम जाएगायानी खाप को 'माता रानी' का पाप खाएगा... कापड़ी न्यूज़ चैनल की तरह ही फिल्मों में छिछोरगर्दी दिखाएगा? 

हल - (उत्तर) माना कि - विनोद कापड़ी की फिल्म रिलीज़ हो गई सब तैयार - कभी इंडिया टीवी में 'पतुरिया' नचवा के टीआरपी दिलाने वाले कापड़ी अब सुभाष घई जैसी टुच्चई करेंगे, चोली के पीछे माधुरी को नचवाने जैसा कुछ काम. - ढाक के तीन पात

मदारी होंगा - 'विनोद कापड़ी'...(माइन-प्लस पुराने जैसा)

बाकी फिल्म के कलाकार होंगे 'जमूरे'.. (हमेशा माइनस)

(झूठे तिलस्म की रचना - (यानी कथा)  में कैसा होगा संवाद?)

कापड़ी - जमूरे.. 'भैंस की त्वचा काली' क्यों पड़ी..?

एक कलाकार - विनोद जी पता नहीं..!

कापड़ी- अबे, भूतनी के...'काली पड़ी' क्योंकी गया है, 'का-पड़ी'.. 'भैंस की काली त्वचा' दिलाएगी नाम और शोहरत..

दूसरा कलाकार - विनोद जी लेकिन ये फिल्म..

कापड़ी- तेरी फिल्म की मां की...(??) (ओह सॉरी भूल गया ये तो मेरी ही फिल्म है)

तीसरा कलाकार - फिर सर  भैंस को गोरा दिखाया जाए...

कापड़ी- अबे देख भैस के गले में 'नींबूं-मिर्च' लटका दे.. कई दिनों तक रहेगा संस्पेंस का मायाजाल.. चौथे दिन फिल्म का 'चौथा' (प्रीमियर) होगा..तो क्रिटिक्स की तारीफों का  विस्फोट होगा.. 

(परिणाम)कापड़ी खुश+ खाप  खुश+ चमचे भी खुश..(-)  

=  फिल्म नाम की विधा का सामूहिक बलात्कार देख हर कोई फोड़ेगा माथा..

तो भाइयों..अब आगे-आगे देखिए विनोद कापड़ी की 'मस्तराम-गाथा' - 

जिसे सुनाएगा फिल्म का शिकार हुआ हर अभागा...

इति सिद्धम (कार्य दुर्गम)

(BBMK डेस्क)