दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
(चेतावनी- इस ब्लॉग के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) ब्लॉग के संचालनकर्ता और लेखक वैभव आनन्द के पास सुरक्षित है।)

शनिवार, 20 अगस्त 2016

मैं कौन हूं?

उसकी यादों से         गुज़र आया मैं
तमाम खुश्बुओं से       नहा आया मैं।

वो अपने रस्ते        जा चुका कब का
उन्हीं रास्तों से      हाल पूछ आया मैं।

कुहुक उठती थी     जिस राग में कोयल
उन्हीं रागों को  वादियों से चुरा लाया मैं।

इक कचहरी खुली थी     फैसले के लिए
वहां सारी तकरीरें  खोखली कर आया मैं।

शहर जो इतराता था     अपने अदब पर
उसी शहर से    सारे अदब उड़ा लाया मैं।

बस वजीर से ही आस थी   उन्हें खेल में
उसे अपने प्यादे से       पीट आया मैं।

चौरासी खंभे थे     जिनकी पहचान कभी
उन खंभों की हकीकत बयां कर आया मैं।

इतना सब करके भी   जब मन ना भरा
पाबंदीशुदा सारे      नारे लगा आया मैं।


गुरुवार, 18 अगस्त 2016

मेढकों को 'मुंह' कौन लगाता है

वो, हर उस खेल में,
मुझसे जीत जाता है
जहां उसे 'खुद' को उठाना,
मुझे गिराना आता है।

हूं परेशान,                
मैं अपनी हालत पर
जिसपे दुनिया को हंसना,      
मुझे रोना आता है। 

वो मेरा 'शागिर्द' था,              
अब 'सीख' गया है
तमाम चालें,   
जिसे सोच 
'जिस्म' कांप जाता है।

उसकी हर मात का                      
क्या काट लाऊं,
ये बुरा ख्वाब मुझे रोज़                 
जगा जाता है।

नामालूम कैसी सोच है                 
आज लोगो में
इक सिरा थामता हूं,             
दूजा छूट जाता है। 

पीछे छूट चुके                          
तमाम लम्हों का,
आईना रोज़                        
हिसाब मांग जाता है।

कुएं में कुछ दिन बिताना         
मेरी मज़बूरी है
वरना मेढकों को              
' मुंह' कौन लगाता है?  

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

दुनिया फतह का सपना...

तुम्हारी सोच
एक दिन
मैं बदल दूंगा।
तुम्हारे दिमाग में
मैं अपनी सोच के
'पारे' भर दूंगा।
बिना नारों
बिना वादों के।
बस थोड़ी सी
'चिंगारी' उठने का
इंतज़ार करो।
उस से मैं
'आग' जलाऊंगा

तब पका दूंगा...
'घालमेल की खिचड़ी'
और फिर तुम
जनम-जनम से भूखे
किसी 'कुत्ते' की माफिक
जीभ लपलपाते आओगे
बन जाओगे मेरे 'चारण'
और फिर
मेरे ही 'सुर' में
तुम भी गाओगे।
अगली 'खिचड़ी' की आस में...
चाटने लगोगे मेरे तलवे।
उस दिन मैं...

हां! ठीक उसी दिन से
दुनिया फतह करने का
सपना देखना
शुरु कर दूंगा।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

रोज जियो, रोज मरो..

आप रहते हैं झोपड़े में
तो एक बात
क्यों नहीं आती
आपके 'खोपड़े' में।
महलों के
सपने देखना बंद क्यों नहीं करते।
आज भी सामंत हैं
जो आपको
अपनी 'रियाया' समझते हैं
और आप हैं कि खुद को
'राजा' समझते हैं...
बंद करो ये दिवास्वप्न
मध्यमवर्गीय लोगों।
तुम प्राचीन काल सेअब तक
महज एक 'यंत्र' हो...
जिसे कोई और चलाता है।
राज उसका है,
समाज उसका है
तुम तो
वो दंतविहीन सांप हो जो
आधुनिक सामंतों की
बीन पर नाचता भर है...
और गुमान
ये पालता है
कि उसकी 'फुफकार' भर से
सामंत डर जाएंगे
अरे, छोड़ो...
रोज जियो, रोज मरो..

चार कंधो पे जाती है....

हमे तपता हुआ पाकर, 
आग फिर भी तपाती है...
किसी एक की जलन खातिर, 
वो सब पे नश्तर चलती है..
वो ही है "ब्रम्ह" एक,
गुमान उसको, चिढ़ाती है,
हिकारत से
सभी को देखती
और थूक जाती है...मगर
सच्चे लोगो के बीच उसकी
जहालत खुलती जाती है,
तेरा क्या वास्ता
दुनिया के लोगो से...
मगर ये याद रख
एक लाश भी
चार कंधो पे जाती है....