बुधवार, 10 अगस्त 2016
सोमवार, 8 अगस्त 2016
मैं जल्द आऊंगा...
मैंने नहीं,
तुमने किया था,
सवाल।
जिसका
जवाब खोजते-खोजते
मिले मुझे
अनगिनत सवाल।
सवालों का ढेर
मेरे सामने पड़ा है।
उस वक्त
तुम्हारे
उस ‘एकमात्र’ सवाल का
जवाब नहीं था
मेरे पास।
आज
सवालों के इस ढेर में
किसी का भी
जवाब नहीं मेरे पास।
वैसे तुम्हारा भी
‘जवाब’ नहीं...
मुझे सवालों में
उलझा के तुम
अपनी राह चल दिए।
आज तुम
‘नए जवाबों’ के संग
मस्त हो,
और मैं
सवालों के बोझ तले
पशोपेश में हूं।
पशोपेश में हूं।
तुम्हारा ‘पीछा’ छुड़ाने का
ये ‘नायाब’ तरीका
मुझे पसंद आया
मगर मैंने,किसी पर इसे
नहीं आज़माया।
किसी को भ्रम में डालना
उसकी ‘मानसिक-हत्या’
करने जैसा है।
तुम हत्यारे हो...
मगर दिल के
किसी कोने में
अब भी हमारे हो...।
जिस दिन वो कोना
ओझल हो जाएगा
उम्र के दिए ‘मोतियाबिंद’ से
तब, मैं तुमसे
जवाब मागूंगा....।
तुम्हारा पुराना सवाल
तुम्हें याद दिलाऊंगा।
जवाबों के साथ-साथ
अपने गुजारे
सभी तन्हा लम्हों का
हिसाब मागूंगा...
तैयार रहना....
मैं जल्द आऊंगा...
इसी जीवन में। शनिवार, 6 अगस्त 2016
रेत पे रोज़ लिखता है...
गिरता है
संभलता है
फिर उठ के
चलता है...
ये इंसान
कहां सुनता है
स्वंयभू राजा है
मनमानी करता है
टूटते हैं रोज़
पर रोज़ ख़्वाब
बुनता है
रोता है,
कोसता है,
फिर हंस के
मिलता है
नादान
किसी बच्चे सा
रोज़ ही बहलता है
आभावों से दोस्ती की
फितरत बनाता है
रेत पे रोज़
लिखता है
जो पल में
मिट जाता है
जिद्दी है वो
दोबारा लिखने को
हर रोज़
आता है
ये इंसान
कहां सुनता है।
गला कटवाने के बाद....
आंकड़ों में बदल जाती हैं
वारदातें...
कुछ दिनों के बाद...
इतिहास बन जाती हैं
वारदातें...
कुछेक सालों बाद...
ना आंकड़ें बदलते हैं
ना ही इतिहास...
मरते जाते हैं मासूम...
एक-एक के बाद।
ये आलम-ए-वहशत है
जिसे ना खत्म होना है...
मान बैठते हैं हम
हर एक
हादसे के बाद...
सियासत के खेल में
पिसता है मासूम
सियासी लोग
अपने को बचा लेते हैं
थोथे बयानों के बाद...
वो जिसकी तामीर हुई
नफ़रती बुनियाद पर
उसे फिर गले लगा लेते हैं
हर बार
गले कटवाने के बाद...।
वारदातें...
कुछ दिनों के बाद...
इतिहास बन जाती हैं
वारदातें...
कुछेक सालों बाद...
ना आंकड़ें बदलते हैं
ना ही इतिहास...
मरते जाते हैं मासूम...
एक-एक के बाद।
ये आलम-ए-वहशत है
जिसे ना खत्म होना है...
मान बैठते हैं हम
हर एक
हादसे के बाद...
सियासत के खेल में
पिसता है मासूम
सियासी लोग
अपने को बचा लेते हैं
थोथे बयानों के बाद...
वो जिसकी तामीर हुई
नफ़रती बुनियाद पर
उसे फिर गले लगा लेते हैं
हर बार
गले कटवाने के बाद...।
शनिवार, 30 जुलाई 2016
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