दिल की नज़र से....

दिल की नज़र से....
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शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

MY RESUME

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रविवार, 4 सितंबर 2016

ये आप बताएं....?


इक गुलशन था, 
थोड़ा उजड़ा
थोड़ा हरा-हरा था
उसमें बरगद सी मां थीं
मैं गुलाब का पौधा था
पीपल जैसे पिता
सूख कर टूट चुके थे
गुलशन में 
दो नन्हीं परियां रहती थीं...
बरगद और गुलाब से दोनो
काफी घुली-मिली थीं
एक दिन एक माली आया
परियों को लेकर चला गया
बरगद आधा सूख गया
गुलाब भी कुम्हला सा गया
पर बरगद की छांह तले
गुलाब फिर उग आया था
लेकिन परियों की चहल-पहल
वो भी कभी भुला ना पाया 
बरगद और गुलाब दोनो
तन्हा से उस गुलशन में
नए मौसम की आस में
जीने लगते थे
मौसम दर मौसम बदले
इंतज़ार बेहद लंबा था
मौसम भी बदला 
लंबे इंतज़ार के बाद
तब तक बरगद 
और सूख गया
गुलाब में नईं कलियां आईं
पर खिलने से पहले ही
वो मुरझा गईं
अब तो बरगद पूरा सूखा
और हवा के झोंके से
बरगद भी गिर गया
अब एक अकेला 
पौध गुलाब का...
उसे अकेले लड़ना था
पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण
हर ओर हवा उल्टी ही थी...
कितने गुलाब बिखरे मिट्टी में
कितनी कलियां खिल ना पाईं
अब गुलाब को छांह नहीं
बरगद भी अब साथ नहीं
उम्र गुलाब की कितनी होगी
ये आप बताएं....?

बुधवार, 31 अगस्त 2016

अंजाम की फिक्र...!

तुम क्या गए, रौनकें गईं      इस जहान की,
ज्यों चांद छोड़ गया महफिल आसमान की।

वो तोड़ आया सारे रिश्ते          एक पल में,
अब ढूढ़ता निशानी        खुद के पहचान की।

बबूल के शूलों ने उसकी तक़दीर क्या लिखी,
वरना वो भी बेल थी,             मेरे मचान की

जब उधर से               पत्थरों की आमद थी,
इधर मस्जिद में थीं         रौनके अज़ान की। 

तमाम लानतें मुझपे भेज       वो चल दिया,
अब तक समझ ना आई फितरत इंसान की।

हर ओर जब           आईनों जैसे लोग मिले,
तब तलाशी ली            अपने गिरहबान की।

दिलचस्प आग़ाज़ था           उस कहानी का,
मुझे फिक्र थी                  उसके अंजाम की।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

हवा के रुख का मारा वो...

किनारों से टकरा के              समंदर टूट जाता है,
मगर पत्थर पे सर देने से  कब वो बाज आता है।

माना हर कहानी                सच नहीं होती,मगर, 
हर नया किरदार            ज़ेहन में घर बसाता है।


जुदाई क्या है                       ये उनसे ज़रा पूछो,
जिनका कोई अज़ीज़       सफ़र में छूट जाता है।


मुक़ाबिल आईने के                   मैं ही हूं हरदम,
तभी हर बार मुझसे            वो मुंह की खाता है।


उसे हामी मिलेगी                या नकारा जाएगा?
हवा के रुख का मारा वो   ना अब शर्तें लगाता है।


गुरुवार, 25 अगस्त 2016

धरती के खुदा!

मेरे ऊपर भी
एक खुदा है
जो ना जप से
ना तप से
ना भोग से
खुश होता है।
ना नमाज़ उसे भाती है,
ना अज़ान उसे लुभाती है।
उसे रुपयों का भोग चाहिए,
नोटो की गड्डियां
नमाज़ के बदले चाहिए।
मैं उसकी भूख का
तोड़ ढूढ़ने निकला था,
मगर सारे रास्ते
रुपयों पे जाके
खत्म होने लगते हैं।
किस्मत का लिखा,
पढ़ने वालों के पास भी गया
वहां भी वही खुदा है।
बच्चे की दवा लेने गया
वहां भी उसी की सत्ता है।
घर का राशन भी
खुदा को
खुश करके ही मिलता है।.
इन खुदाओं को खुश
करते-करते
मैं थक गया हूं...
मरना चाहता हूं...
मगर ये जानता हूं
कि, शमशान में भी
खुदा है,
जिसे परिजनों को
मुझे जलाने से पहले
खुश करना होगा
खैर मुझे क्या
मैं तो तब तक
आज़ाद हो चुका होऊंगा
धरती के तमाम खुदाओं
और उनकी

रुपयों की भूख से...।